Posted by: riti | Monday, April 7, 2008

मन

एक चुप्पी सी लगी हैं अंदर आग सी जली हैं
दर्द कराहता हैं बाहर आने को
कौन सा माध्यम अपनाऊं जतलाने को
नम आँखें जब आँसू बहाए
भारी मन तनिक हल्का हो जाए
मन की गुत्थी खेले कबड्डी
ना चित ना पट पर होए जिद्दी
दिग्भ्रमित हो मन भागा जाए
पर कड़क के कुछ पकड़ ना पाए
बौछार शुरू होती बद-दुआओं की
कभी खुदी तो कभी खुदा
बड़-बड़ बड़-बड़ करता जाए
रोक ना पाए कोई मन को
कभी लाचार तो कभी क्रोध का प्रहार
ये रोता भी हैं ये हँसता भी हैं
ये हैं मन , ये है मन


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